अपने अस्तित्व की लड़ाई में कमजोर होती बसपा के पास बचे सिर्फ 7 विधायक

यूपी : विधानसभा चुनाव से पहले जहां सभी सियासी पार्टियां अपने जनाधार को मजबूत बनाने में जुटी हैं. वहीं चार बार सत्ता पर काबिज रही बीएसपी मौजूदा दौर में इतना कमजोर हो गई है की अपने विधायकों और नेताओं को भी नहीं बचा पा रही है. सूबे में मायावती के विधायकों की संख्या अपना दल से कम और कांग्रेस के बराबर रह गई है।

यूपी विधानसभा चुनाव से पहले मायावती की बहुजन समाज पार्टी मौजूदा वक्त में सबसे खराब दौर में हैं. हालात ये हैं की विधयाकों की संख्या अपना दल से भी कम रह गई है यानी की बसपा की हालत एक क्षेत्रीय पार्टी जैसी रह गई है. साल 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली मायवती को उनके कई नेता छोड़कर दूसरी पार्टियों में चले गए और कइयों को पार्टी ने बाहर कर दिया गया. पार्टी के मुस्लिम नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी कांग्रेस, जबकि पार्टी के बड़े ब्राह्मण चेहरा बृजेश पाठक और पिछड़ा वर्ग के नेता स्वामी प्रसाद मौर्या बीजेपी के हो गए।

साल 2017 के विधानसभा चुनाव में मायावती को 19 सीट ही मिल पाई थी, लेकिन एक सीट वो उपचुनाव में हार गई थी. बची सिर्फ 18 सीट, लेकिन फिर भी मायावती जनता का मूड और विधायकों के मिजाज ठीक से भांप नहीं पाई. राज्यसभा चुनाव के दौरान अखिलेश यादव से संपर्क में आने वाले 7 विधायकों असलम राईनी ,असलम अली ,मुज्तबा सिद्दीकी , हाकिम लाल बिन्द, हरगोविंद भार्गव , सुषमा पटेल और अनिल सिंह को निलंबित कर दिया गया. जबकि दो विधायक वंदना सिंह और रामवीर उपाधयाय भी बागी हो गए. मायावती इसके पहले भी कई पूर्व विधायकों और संगठन के पदाधिकारियों को बाहर कर चुकी हैं. जबकि कई नेताओं ने उनका साथ छोड़ दिया।

कुछ दिन पहले ही उन्होंने दो कद्दावर नेता और मौजूदा विधायक लालजी वर्मा और राम अचल राजभर को पार्टी से निकाल दिया था. इस तरह पार्टी में सिर्फ सात विधायक बचे हैं, जिसमें पूर्वांचल से आज़ाद अरिमर्दन , उमाशंकर सिंह ,मुख़्तार अंसारी, विनय शंकर तिवारी, शाह आलम उर्फ़ गुड्डू जमाली और पश्चिमी यूपी से सर्फ श्याम सुन्दर शर्मा ही बचे हैं. कल ही बसपा के सात बागी विधायकों ने अखिलेश यादव से मुलाकात की. माना जा रहा है की कुछ विधायक पार्टी में शामिल होकर सपा के टिकट सपा के टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैं. जिस पर आज मायावती ने ट्वीट करके समाजवादी पार्टी को दलित विरोधी बताकर हमला किया. हालांकि सपा का कहना है की कई पार्टियों के नेता उनके संपर्क में हैं।

यूपी की राजनीति को करीबी से जानने वालों का कहना है की मायावती ने न तो जनता से संवाद रखती है और न ही अपने नेताओं से. वो पार्टी को सिर्फ कागज़ों पर चलाती है, जबकि सभी सियासी पार्टियां दौरे करती है , सभाएं करती हैं और मीटिंग रखती है.  जबकि मायावती सिर्फ आर्थिक साम्राज्य को महत्त्व देती हैं न की पार्टी संगठन या कैडर को. बीजेपी, कांग्रेस और सपा से गठबंधन कर चुकी पार्टी सिमट चुकी है और अब उसको ताकत मिल पाना बहुत मुश्किल  है।

जिन लोगों ने कांशीराम से लेकर मायावती की सियासी समीकरण को देखा है, उनके मुताबिक कांशीराम ने संगठन को मजबूत बनाने की कवायद आखिर तक की. लेकिन मायावती ने उस कैडर को खो दिया, धीरे-धीरे कई नेता उनसे अलग हो गए. लेकिन मायावती ने कभी उसकी परवाह नहीं की. वो न तो नेताओं से ज्यादा बात करती हैं और न ही जनता के बीच जाती हैं।

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