यूपी में राजनीतिक हलचल तेज, दिल्ली पहुंचे योगी आदित्यनाथ, पीएम मोदी, अमित शाह व जेपी नड्डा से हो सकती हैं मुलाकात


संगठन में बदलाव और नेतृत्व पर भी हो सकती है चर्चा


लखनऊ : प्रदेश की राजधानी में विगत एक माह से सियासत सरगर्मी तेज है। कभी नेतृत्व परिवर्तन तो कभी संगठन बदलाव तो कभी मंत्रीमंडल विस्तार की खबरें रोज सुर्खियों में रही। कहते हैं कि राजनीति में जहां सब कुछ जायज है और कभी भी कुछ भी हो सकता है तो शायद इस समय यूपी की राजनीति में कुछ ऐसा ही दिखता है लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि यूपी की राजनीति में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है।

यूपी के सीएम योगी का अचानक दिल्ली जाना क्या प्रदेश की किस राजनीति की ओर संकेत कर रहा है यह तो कल तक ही साफ हो पायेगा लेकिन एक बात साफ है कि कुछ बडा होने वाला है। पीएम मोदी का दूसरे पाली में जिस तरह जोरदार इंट्री हुई थी वह दिन पर दिन कमजोर दिखने लगी। वैश्विक महामारी कोरोना ने जहां पहले कोरोना लहर में विश्व में मोदी के सोहरत में जरूर इजाफा किया लेकिन दूसरी लहर में देश के अन्दर सरकार कटघरें में कई जगह घिरती नजर आयी। बची खुची कसर बंगाल में ममता दीदी ने कर दिखाया।

बंगाल चुनाव में जिस तरह से मोदी जी और उनकी पूरी टीम ने ताकत झोकी वह किसी से छुपी नहीं लेकिन इतने के बाद भी पहले से ताकतवर हो कर ममता का उभरना भाजपा व संघ को अन्दर तक हिला कर रख दिया है।

उत्तर प्रदेश में जिस तरह से योगी सरकार ने विकास के मॉडल, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में सक्रियता, कोरोना रोकथाम के लिए जिलों का दौरा किया। वह भले ही भाजपा व योगी सरकार अपनी अच्छे काम वाली फाइल में दर्ज करले लेकिन पंचायत चुनाव में लगे झटकों से यह बात भी साफ हो गयी कि जनता शायद कुछ और चाहती है। शायद इसी कुछ और के मर्म को समझने के लिए योगी को दिल्ली बुलाया गया है। वैसे पहले कोशिश यह जरूर की गयी कि कुछ और पर मंथन प्रदेश की राजधानी में ही निकल जाये लेकिन मंथन कौन कहें इसने कई नये समीकरण को जहां जन्म दे दिया वहीं कई बार तो सीधे सीएम की कुर्सी पर ही मंथन की नौबत आ गयी।

राजनीतिक सूत्रों की माने तो प्रदेश में कहीं न कहीं इस बीच एक महिनें की राजनीतिक हलचल ने तीन खेमा में सत्ता पार्टी की राजनीति को बाट कर रख दिया जिसके चलते अभी चारों तरफ सन्नाटा है। वैसे सरकार के प्रबंधन व तैयारियों के दावों की सच्चाई समझने, पंचायत चुनाव के भाजपा के पक्ष में अपेक्षित नतीजे न आने की वजह जानने की कोशिश की गयी। सरकार व संगठन की नब्ज पर हाथ रखकर बीमारियां समझीं गयी और फाइल को शीर्ष नेताओं के सामने रख दी गयी।

वैसे एक बात साफ है कि भाजपा व संघ किसी भी सूरत में यूपी को खोना नहीं चाहती है। चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े। यह बात और है कि इस कुछ और में किसकी बलि चढ़ेगी और किसके हाथ भानुमति का पिटारा लग जाए। वैसे यह भी कयास लगाना कोई बहुत कठिन नहीं है। यह बात साफ है कि आने वाले 24 घंटे में जो कुछ होगा वह तीन लोंगो के इर्द-गिर्द घुमता हुआ ही होगा लेकिन यह बात भी साफ दिख रही है कि अब तीनों एक दूसरें के अंडर में काम करने के लिए शायद ही तैयार हों। वैसे एक की इंट्री को प्रदेश में रोक भी दिया जाए तो भले ही कुछ न बिगडे लेकिन दो लोगों का साथ चलना प्रदेश में भाजपा की राजनीतिक मजबूती के लिए बहुत ही जरूरी है और यह बात भाजपा के शीर्ष नेता भी जानते हैं।

गौरतलब है कि छह महीने बाद प्रदेश में विधानसभा चुनाव हैं। ऐसे में यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि योगी कैबिनेट में फेरबदल होगा और एमएलसी बने ए के शर्मा को कैबिनेट में कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है। यह बात भी किसी से छुपी नहीं है कि शर्मा पीएम मोदी जी के पसंद हैं। ऐसे मंे कहीं यह बर्चस्व की लडाई की स्थिति न उत्पन्न कर दें। इसकी भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा हैं।

बहरहाल योगी जी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात यूपी के सियायत में क्या बदलाव लायेगा, यह देखने की बात होगी। वैसे यह तय है कि आने वाले 24 घंटों में दिल्ली में ऑपरेशन यूपी 2022 का ब्लू प्रिंट तैयार होगा। इसके तहत मंत्रिमंडल में कुछ बदलाव के साथ विस्तार व अधिकारियों की चुनाव तक नए सिरे से तैनाती तक हो सकती है। इस ब्लू प्रिंट का प्रभाव प्रदेश में बदलाव के रूप में तो सामने जरूर आएगा, लेकिन इसके संगठन और सरकार के कुछ मंत्रियों की भूमिका बदलने तथा नौकरशाही के कुछ प्रमुख चेहरों की काट-छांट तक ही सीमित रहने के आसार हैं। इसका मुख्य आधार ‘पॉलिटिक्स ऑफ परफॉरमेंस’ व डैमेज कंट्रोल ही होगा। वैसे फिलहाल अब दूर तलक मुखिया परिवर्तन का संकेत कहीं नजर नहीं आ रहा है।

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